हिचकी
- अतुल श्रीवास्तव
- May 13
- 4 min read
Updated: May 14

जब आदमी नौकरी के चंगुल से मुक्त हो जाता है तो उसे हर नगण्य चीज में भी आनंद दिखाई और मिलने लगता है - वही नगण्य चीजें जो हमेशा से उसके चारों ओर थीं पर उन पर कभी खास ध्यान गया नहीं या उन पर ध्यान दिया ही नहीं गया| अनिल उम्र के छः दशक और नौकरी के तकरीबन चालीस साल पूरे करने के बाद अब पूरी तरह से नौकरी-निवृत या सभ्य भाषा में सेवानिवृत है| अब उसे भी उन सभी छोटी छोटी चीजों में आनंद मिलने लगा है जो या तो उससे खो गये थे या जिन्हें वो नौकरी के चंगुल में फँसने के बाद धीरे धीरे भूल गया था|
चाय तो रोज़ ही पीता था - पर पहले अक्सर खड़े खड़े ही गटक जाया करता था क्यों कि ऑफिस समय पर पहुँचना जरूरी होता था - चाय थी, स्वाद था, चाय की गर्मी भी थी पर चाय की चुसकी का आनंद न था| पर अब दृश्य कुछ अलग ही है| अनिल अब आराम से सो कर उठता है जब नींद खुद ही आँखें खोलती है, गरम गरम चाय ले कर अक्सर बालकनी में एक आरामदायक कुर्सी पर बैठ कर धीरे धीरे चाय की चुसकियाँ लेता है - न ऑफिस पहुँचने की जल्दी और न ही ट्रैफिक से हाथापाई| चाय अब कुछ ज्यादा ही मजेदार लगती है - हूँ, लगता है आज चाय में इलायची पड़ी है, अदरक का तीखापन भी आ रहा है - शायद इतनी बारीकियाँ जुबान पर पहले नहीं तैरी थीं| फिर चुसकी लेते लेते - अरे संगीता, देखो अमलतास का पेड़ तो पीले फूलों में गायब हो गया है| संगीता बस हल्के से मुस्करा कर कहती - अरे ये तो हर साल ही ऐसे फूलों से ढक जाता है|
रोज़ की तरह आज भी हाथ में अखबार ले कर अनिल कड़क चाय का रसास्वादन कर रहा था कि अचानक एक मीठी सी खुशबू अनिल के चारों ओर मंडराने लगी| अनिल की वैसे तो कई कमजोरियाँ हैं पर रत्नागिरी के रसीले आम शायद उसकी सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक होंगें| वो कल ही रत्नागिरी आमों की एक पूरी पेटी खरीद कर लाया था| आम वैसे तो अंदर रखे थे पर उनकी मनमोहक मीठी खुशबू पूरे घर का दौरा कर के लहराते लहराते बालकनी में भी आ पहुँची| अनिल चाय के आनंद के साथ आमों की खुशबू में भी गोते लगाने लगा| क्यों कि अनिल अब नौकरी-निवृत है, इसलिये आम की मादक सुगंध अपने साथ आनंद वृद्धि करने के लिये कुछ और भी समेट लाई - सुगंध के आगोश में दुबक कर आई एक उतनी ही मीठी याद|
अनिल के बचपन के साथी अजीत की याद| अनिल और अजीत बचपन से बारहवीं तक साथ साथ पढ़े थे - शुद्ध हिन्दी में दोनों थे और हैं "लंगोटिया यार"| उस दौर में न तो इंटरनेट था और न ही था मोबाईल फोन| दोनों या तो मैदान में गिल्ली -डंडा खेलते हुए पाए जाते थे या वो काम करते हुए जो उस जमाने के छोटे शहरों और कस्बों में रहने वाला हर लड़का करता था - आम के पेड़ों से आम चुरा कर खाना| न जाने क्यों उस समय के लड़कों को पेड़ से चुरा कर आम खाने में क्या विशेष आनंद आता था| दोनों के मोहल्ले के कुछ दूरी पर आम का एक छोटा बगीचा था| जब पेड़ों पर बौर फूटती थीं तो भौंरे और मधुमक्खियाँ मंडराने लगती थीं, और जब बौर बन जाते थे आम तो मोहल्ले के उपद्रवी लड़के हाथ में गुलेल ले कर पेड़ के चारों ओर मंडराने लगते थे|
ये दोनों यार भी अव्वल दर्जे के आम चोर थे| जब मौका मिलता अनिल अपनी साईकिल के कैरियर पर अजीत को पीछे बैठा कर निकल पड़ता आम के बगीचे की ओर| जब दोनों का दिन खराब होता था, गुलेल का निशाना सही नहीं पड़ता था या बगीचे का रखवाला पीछे कुत्ता छोड़ देता था तो चोरी के सिर्फ एक ही आम से दोनों को संतुष्ट होना पड़ता था| दोनों बिना आम धोये उसको पिलपिला कर बारी बारी से मुँह लगा कर आम के रस का आनंद लेते थे|
इस याद ने अनिल के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान चिपका दी और आँखों से दो बूंदें भी टपका दीं जो खारी नहीं, आम और याद की तरह मीठी थीं| इसी समय शहर के दूसरे छोर पर तीस किलोमीटर दूर अजीत को अचानक जोर से हिचकियाँ आने लगीं| अनिल ने मन ही मन कहा - अजीत बाबू, हिचकियाँ तो आ रही होंगी| हिचकियाँ भगाने का इंतजाम करता हूँ|
अनिल ने चाय खतम की, उठ कर अंदर गया, एक स्टील का गोल डिब्बा निकाला, डिब्बे में एक खूबसूरत सा रुमाल बिछाया और उस पर सलीके के साथ रत्नागिरी आमों को सजाया| संगीता ने पूछा - ये क्या कर रहे हो?
"कुछ नहीं| मंदिर जा रहा हूँ - दर्शन करने और प्रसाद चढ़ाने|"
अनिल ने गराज में कार के पीछे पड़ी साईकिल निकाली, रुमाल से गर्दा उड़ाया, कैरियर पर आम वाला स्टील का डब्बा बाँधा और पैडल मारते हुए निकल पड़ा पुराने यादों को चूमने के लिये| तीस किलोमीटर कैसे निकल गये पता ही नहीं चला| अनिल ने साईकिल को स्टैंड पर खड़ा किया, आम वाला डब्बा उठाया और जोर से दबा दी कॉल बेल| दस सेकेंड बाद दरवाजा खुला - सामने खड़ा था जोरदार हिचकियाँ लेता हुआ अजीत|
"अबे, जोश! तू यहाँ कैसे| अंदर आ साले| तूने तो रुला ही दिया यार|"
अब बारी थी अजीत की आँखों से कुछ बूंदें टपकने की - और इन बूंदों के साथ बह गई अजीत की हिचकियाँ| अनुजा ने चाय बनाई दो नौकरी-निवृत दोस्तों के लिये| चाय की चुसकियों के साथ पुरानी यादें पारले -जी की तरह मजा दुगना करने लगीं| साईकिल की सवारी और आम चोरी के किस्सों का आदान-प्रदान हुआ, ठहाके लगे और गले लगे|
इसी बीच अजीत को याद आया - जोश, कार कहाँ खड़ी करी है? मेरे घर के सामने कर लो वरना पड़ोसी नाटक करेंगे|
कार? अरे यार मैं तो साईकिल से आया हूँ|
साईकिल से? क्यों भाई ऐसी भी घनचक्करी क्यों? गाड़ी खराब-वराब हो गई है क्या? या ड्राईवर भाग गया?
अरे ऐसा नहीं है| किसी गंतव्य स्थान पर जाना होता काम-शाम से तो गाड़ी से जाता| मैं तो यादों से मिलने के लिये निकला था - इसीलिये यादों की साईकिल पर सवार हो कर आया हूँ, और हाँ, यादों के आम भी लाया हूँ| बस ये ससुरे आम चोरी के नहीं हैं|
ठहाकों के साथ अजीत ने आवाज लगाई - अरे अनुजा, आप सिर्फ एक आम पिलपिला कर के ले आओ हम दोनों के लिये| और हाँ, उसे धोना मत|
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अतुल श्रीवास्तव
[फोटो: गुआटेमाला]



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