सुखानुभूति
- अतुल श्रीवास्तव
- Mar 28
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अखंड और अविरत सुखानुभूति संभवतः ईश्वर प्राप्ति की भाँति है - अनंत आजीवन तप करना पड़ता है, तदुपरांत भी उसे पाने की संभावना राई के दाने समान ही होती है। परंतु जीवन में क्षणिक सुखानुभूति का अपरम्पार भण्डार होता है। क्षणिक सुखानुभूति उस बरखा समान होती है जो अकस्माक बिना सूचित किये आ कर बौछारों से मन पुलकित कर देती है। एक ऐसी ही बारिश ने कुछ दिन पहले मेरे ऊपर बौछारों का छिड़काव किया।
फरवरी माह के अंत में मैं तमिलनाडु की यात्रा पर निकला। जाने से पहले मुझे इस बात का तनिक भी भान न था कि फरवरी का अंत आते आते तमिलनाडु सूर्य महाराज के रौद्र रूप से ग्रसित होना प्रारम्भ हो जाता है। यात्रा का एक पड़ाव था ऐतहासिक शहर काँचीपुरम। दोपहर के १२ बजे के पास जब सूर्य ठीक सर के ऊपर मंडरा रहा था, मैं और तूलिका अचंभित कर देने वाले कैलाशनाथर मंदिर देखने पहुँचे। ये एक पारंपरिक पूजा-पाठ वाला मंदिर नहीं है अतः यहाँ अन्य मंदिरों की भाँति लोगों की भीड़ न थी। मंदिर के प्रांगण में हम दोनों, कुछ एक लोग और, और आठ या दस विदेशी पर्यटक छितरे हुए थे। प्रांगण के पत्थर आग-बबूला हो रहे थे, ठुमक ठुमक कर लहराने वाली हवा भी गर्मी के प्रकोप से डर कर कहीं जा कर छुप गई थी, और सूर्य महाराज गर्मी अपनी पूरी शक्ति के साथ झोंक रहे थे। खौलते हुए पत्थर नंगे पैरों से तलवे की खाल गलाने का भरपूर प्रयत्न कर रहे थे। परंतु इन सभी ताड़नाओं के उपरांत भी मैं पत्थरों में की गई चित्रकारी को सम्मोहित हो कर निहार रहा था। चित्रकारी इस उत्तम स्तर की कि शारीरिक पीड़ा भी मंत्र मुग्ध हो कर आनंदित हो उठी।
इस अद्भुत कलाकारी और दृश्य को सदैव अपने साथ रखने के लिये मैं तन्मय हो कर उन्हें अपने कैमरे में बटोरता जा रहा था। मुझसे थोड़ी दूर पर सहेलियों का एक झुंड था जो स्वयं सेल्फी और विभिन्न मुद्राओं में अपनी फोटो उतारने में व्यस्त था।
उनमें से एक लड़की मेरे पास आई और कुछ तमिल में कहा। शीघ्र ही हमारा वार्तालाप संकेतों और टूटी फूटी अंग्रेजी में प्रारम्भ हो गया। उसने मुझसे उन सबकी फोटो खींचने को कहा। मैंने जब उससे उसका फोन फोटो खींचने के लिये माँगा तो उसने कहा कि मैं उन सबकी एक अच्छी सी फोटो अपने कैमरे से खींचूँ। फिर प्रश्न आया कि मैं कैमरे से फोटो उसको दूँगा कैसे। पर संभवतः आधुनिक तकनीकि के पास अधिकांश समस्याओं का हल और समाधान है।
सभी बच्चियाँ खिलखिलाती हुई खड़ी हो गई। मैंने एक फोटो खींची, उन्होंने उसे कैमरे की स्क्रीन पर देखा, और एक और फोटो खींचने का आग्रह किया। इस बार बैठ कर पोज दिया गया।
अब प्रारम्भ हुआ तकनीकि का जादू। मैंने कैमरे का ब्लूटूथ के माध्यम से फोन से आलिंगन करवाया, फोटो को कैमरे से फोन पर उतारा और फिर वहीं खड़े खड़े उन फोटुओं को उस लड़की को व्हाट्सऐप कर दिया।
जैसे ही उसे व्हाट्सऐप पर फोटो मिली, उसकी सहेलियों ने उसे घेर लिया और बहने लगा खिलखिलाहटों का प्रपात। कोई फोटो को ज़ूम कर के खिलखिलाता तो कोई फोन खींचने लगता। फिर फोटुयें एक फोन से सभी के फोन पर आ गई - व्हाट्सऐप के माध्यम से। अब तो हर बच्ची अपने अपने फोन पर फोटो देख कर खिलखिलाती - ज़ूम करती और उसी खिलखिलाहट के साथ एक दूसरे से तमिल में कुछ कहती। एक दो नेे आ कर मुझे थैंक यू भी कहा। मैं वहाँ से धीरे धीरे चलने लगा पर खनखनाती हुई खिलखिलाहट अभी भी सुनाई दे रही थी।
तूलिका बोली - ये बच्चियाँ दो फोटो पा कर कितना खुश हो रही हैं, लगता है जैसे कोई खजाना मिल गया हो। फिर एक एक क्षण के बाद तूलिका ने पुनः कहा - आज तुमने इन लड़कियों को खुश कर दिया।
उसी क्षण उन बच्चियों पर क्षणिक सुखानुभूति की बारिश करने वाले बादल से एक छोटा सा टुकड़ा अलग हो कर मंडराता हुआ मेरे ऊपर आया और सुखानुभूति छिड़कने लगा।
तथ्य, जो मैं हमेशा भूल जाता हूँ, उस दिन पुनः मेरे समक्ष आ खड़ा हुआ कि दूसरों को सुख दे कर जो सुख स्वयं को प्राप्त होता है वह अद्वितीय है - चाहे वो कृत्य कितना ही नगण्य प्रतीत होता हो।
मेरे विचार में अखंड और अविरत सुखानुभूति की प्राप्ति मेरे सामर्थ्य से परे है, और अब मैं इसके लिये प्रयत्न भी नहीं करता हूँ। उसके विकल्प में मैं अपेक्षा करता हूँ अनगिनत क्षणिक सुखानुभूति के सुगंधित पुष्पों की। और वो पुष्प इतने हों कि मैं उनसे प्रतिदिन अनगिनत मालायें बना सकूँ।
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अतुल श्रीवास्तव
काँचीपुरम, तमिलनाडु
फरवरी २४, २०२६
[फोटो: काँचीपुरम, तमिलनाडु]



एक साधारण दैनिक घटना के माध्यम से इतने गहरे विचारों का अत्यंतअत्यंत सुंदर चित्रण किया है! बहुत खूब!!