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परिवर्तन

  • shria0
  • Aug 14, 2025
  • 1 min read

एकाकी अंधियारी रात में कौन आ दीपक जला गया?

रिक्त हृदय का प्रांगण, चुपके से पुष्प लता से सजा गया?


धूलि ढकी शुष्क मृदा में स्व अवलोकन हुआ है रोपित,

नव जीवन तुषार बन करता मन उपवन शोभित|


नदिया के सूने प्रवाह में हर पल गूँज रहा सरगम का ताल,

विलुप्त हो रहा धुयें समान भूत घटित कटुता का काल|


गगन गमन सोम से मानो अविरत सोमरस भी झरता है,

रवि का उदय और अस्त अधिक ही मन को हरता है|


जीवन में यह परिवर्तन सहसा कौन है सौंप गया?

हृदय मरु में प्रति क्षण की महिमा के दाने है रोप गया?


यम को झाँसा दे, पंजों से जो उसके बच कर आया,

वो मैं हूँ जिसने स्वयं को स्वयं का नव रूप दिखाया!

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- अतुल श्रीवास्तव

[फ़ोटो: लॉंगईयरबीएन, स्वालबार्ड ]

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-अतुल श्रीवास्तव

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